
बिलासपुर, छत्तीसगढ़: यह खबर आपको हिला कर रख देगी! जिस आदिवासी बालक आश्रम कुरदर को नौनिहालों का भविष्य संवारना था, वह तो “भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला” बन चुका है. शिकायतकर्ताओं और ग्रामवासियों के मुताबिक, यहां अधीक्षक महोदय ने 50 बच्चों की क्षमता वाले आश्रम को अपनी ‘जेब’ भरने का जरिया बना लिया है. सिर्फ 15-20 बच्चे हैं, लेकिन कागजों में पूरे 50 बच्चों की ‘फर्जी हाजिरी’ लगा कर सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा है. यह सिर्फ पैसों का घोटाला नहीं, बच्चों के पेट से निवाला छीनने का जघन्य अपराध है!
सरकारी योजनाओं का चीरहरण, अधिकारी बने ‘मुखदर्शक’:
सरकारें आदिवासी बच्चों के लिए करोड़ों की योजनाएं चलाती हैं, पर यहां अधीक्षक खुलेआम उनका मखौल उड़ा रहे हैं. पूरे 50 बच्चों के नाम पर मोटा फंड और राशन आता है, जो सीधे-सीधे अधीक्षक के ‘महल’ में जा रहा है. लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि आदिम जाति कल्याण विभाग के जिला सहायक आयुक्त, बिलासपुर को शिकायतें भेजने के बावजूद, कान पर जूँ तक नहीं रेंगी. ना कोई कार्रवाई, ना कोई नोटिस! क्या विभाग के बड़े बाबू भी इस ‘खेल’ में शामिल हैं, या उनकी आँखों पर पट्टी बंधी है? यह बड़ा सवाल है!
मीडिया के छापे में खुला ‘राज’, कढ़ाई में पक रही थी ‘मछली-मुर्गा’! पत्रकार को धमकी का ‘मास्टरस्ट्रोक’:

जब समाचार नेशन लाइव न्यूज़ चैनल ब्यूरो चीफ नीरज कुमार तिवारी बिलासपुर छत्तीसगढ़ ने अपनी टीम के साथ आश्रम पर ‘धावा’ बोला, तो अधीक्षक महोदय नदारद! लेकिन रसोईघर का हाल तो कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था. कढ़ाई में बच्चों के लिए दाल-चावल की जगह ‘मछली’ पक रही थी! रसोईये ने बेधड़क कबूल किया कि बच्चों को मछली-मुर्गा भी खिलाया जाता है और तो और, जब जिला स्तरीय ‘खाऊ’ अधिकारी निरीक्षण पर आते हैं, तो उनकी भी ‘पेट पूजा’ इसी से होती है. मतलब, बच्चों के राशन पर अय्याशी और अधिकारी भी ‘गंगा’ में हाथ धो रहे हैं!
और तो और, इस पूरे गोरखधंधे का पर्दाफाश करने वाले पत्रकार को अब ‘धमकी’ मिल रही है! यह दिखाता है कि इन भ्रष्टाचारियों की जड़ें कितनी गहरी हैं और ये कितनी बेशर्मी से अपने काले कारनामों को छिपाना चाहते हैं.
‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ की हदें पार, अब न्याय कब?
जब ग्राम पंचायत कुरदर के सरपंच प्रतिनिधि शिवकुमार मरकाम ने आवाज उठाई, तो हॉस्टल अधीक्षक ने उन पर ही 50 हजार रुपये मांगने का बेतुका आरोप मढ़ दिया. यह तो हद ही हो गई! इसे कहते हैं “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” नहीं, बल्कि ‘उल्टा चोर थानेदार को भी धमकाए’ जैसी स्थिति!
ग्रामीणों की मांग है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष और सीबीआई जैसी उच्च-स्तरीय जांच हो, क्योंकि विभाग के अधिकारी तो आंखें मूंदे बैठे हैं. दोषियों को ऐसी सजा मिले, जो मिसाल बन जाए! सवाल यह है कि कब तक हमारे आदिवासी बच्चे इस तरह के भ्रष्टाचार का शिकार होते रहेंगे और कब उन्हें उनका हक मिलेगा? इस संवेदनशील मामले में प्रशासन की चुप्पी अब सवालों के घेरे में है!



