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रतखंडी रेड घाट: ‘छत्तीसगढ़ जनता की आवाज़’ की एक खबर ने हिला दिया सिस्टम, माइनिंग विभाग की ताबड़तोड़ रेड, 10 ट्रैक्टर जब्त

जनता का बुलडोजर’ कागज़ में दौड़ा, पर असली हंटर ‘कलम’ का चला — माफिया के ट्रैक्टर थाने में, अफसरों की नींद हवा

बिलासपुर/कोटा-बेलगहना: रतखंडी रेड घाट… नाम सुनते ही दिमाग में रेत नहीं, ‘रेत का ATM’ कौंधता था। सुबह मुर्गा बांग दे उससे पहले घाट पर जेसीबी की दहाड़ शुरू। नदी का सीना चीरते-चीरते ट्रैक्टरों की लाइन ऐसी लगती जैसे शासकीय राशन दुकान पर मुफ्त चावल बंट रहा हो। न परमिट, न पर्ची, न पुलिस का खौफ। कानून? वो तो फाइलों में ‘सख्त कार्रवाई जारी है’ लिखकर AC की ठंडक में खर्राटे मार रहा था। 

गाँव वाले चिल्लाते रहे — “साहब, मोबाइल में वीडियो भरा पड़ा है, आँख खोलो।”  

अफसरों का जवाब — सन्नाटा।  

कुछ ‘बहादुर’ अखबार — AC कमरे में बैठकर हेडलाइन ठोक देते: *“जनता का बुलडोजर चला, माफिया में हड़कंप”*। जमीन पर उतरो तो माफिया का ट्रैक्टर ही सीना तानकर धूल उड़ा रहा था।  

 फिर आई ‘छत्तीसगढ़ जनता की आवाज़’ की खबर…  

हमने लिखा — “रेड घाट बना माफिया का ATM, प्रशासन अंधा या हिस्सेदार?”  

खबर सोशल मीडिया पर ऐसी वायरल हुई कि कलेक्टर ऑफिस से लेकर माइनिंग विभाग तक फोन की घंटी बजते-बजते गरम हो गई। व्हाट्सएप ग्रुप में वीडियो, फेसबुक पर कमेंट की बौछार — सिस्टम की इज्जत का फालूदा बन गया।  

 24 घंटे के अंदर सीन पलटा  

माइनिंग विभाग की टीम नींद से हड़बड़ाकर उठी, जीप में तेल-हवा चेक हुआ और सीधे रेड घाट पर धावा। कैमरा ऑन था, अफसरों के चेहरे पर बारह बज रहे थे। नतीजा — अवैध रेत ढोते रंगे हाथों 10 ट्रैक्टर जब्त। जो ड्राइवर कल तक मूंछों पर ताव दे रहे थे, आज थाने के बाहर मच्छर मार रहे हैं।  

 ग्रामीण बोले — “पंद्रह दिन से चिल्ला रहे थे, कोई सुनता नहीं था। खबर चली और साहब दौड़ते आए। मतलब कलम में बुलडोजर से ज्यादा डीजल है!”  

 अब तीन सवाल गरम हैं:  

क्या ये छापा सिर्फ ‘डैमेज कंट्रोल’ था या घाट पर माफिया की एंट्री वाकई बैन होगी?  

10 ट्रैक्टर तो पकड़े गए, जेसीबी वाला ‘बड़ा मगरमच्छ’ कब फंसेगा?  

जिन अफसरों की नाक के नीचे महीनों से खेल चल रहा था, उनकी ‘सेटिंग’ की फाइल कब खुलेगी?  

 फिलहाल इतना तय है — रतखंडी में कलम का हंटर ऐसा चला कि माफिया के ट्रैक्टर की चेन उतर गई। ‘छत्तीसगढ़ जनता की आवाज़’ ने साबित कर दिया कि जब खबर में दम हो, तो सिस्टम को भी जमीन पर उतरना पड़ता है।  

 जनता अब सिर्फ हेडलाइन नहीं पढ़ रही… हिसाब मांग रही है। और अगली बार अगर घाट पर फिर ट्रैक्टर दिखा, तो कलम का अगला वार और तीखा होगा।

 

(Neeraj Kumar Tiwari, Editor-in-Chief)

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