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भरारी के जंगल बने जुआरियों का अड्डा, थाना प्रभारी पर मेहरबानी! दो आरक्षक हटाए गए, ‘बड़े साहब’ बच निकले

भरारी के जंगल बने जुआरियों का अड्डा, थाना प्रभारी पर मेहरबानी! दो आरक्षक हटाए गए, ‘बड़े साहब’ बच निकले

भरारी के जंगल बने जुआरियों का अड्डा, थाना प्रभारी पर मेहरबानी! दो आरक्षक हटाए गए, ‘बड़े साहब’ बच निकले

 

बिलासपुर/पचपेड़ी। जिले के पचपेड़ी थाना क्षेत्र के ग्राम पंचायत भरारी के घने जंगलों में इन दिनों कानून को खुली चुनौती दी जा रही है। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, थाना से महज 10 किलोमीटर दूर रोज़ाना सैकड़ों जुआरी इकट्ठा होकर लाखों का दांव लगाते हैं। खेल का ठिकाना रोज़ बदला जाता है, मानो किसी सुनियोजित ‘ऑपरेशन’ की तरह — जिससे पुलिस की पकड़ से बचाव आसान हो जाए।

 

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे ‘जंगल राज’ से पचपेड़ी थाना प्रभारी कथित तौर पर अनजान बने हुए हैं। जबकि क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि थाने के कुछ आरक्षकों को इस अवैध धंधे की पूरी जानकारी है, और ‘घर पहुंच सेवा’ के जरिए उनका ‘हिस्सा’ भी समय पर पहुंच जाता है।

 

कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति!

जब मामला तूल पकड़ने लगा और ग्रामीणों का गुस्सा फूटने लगा, तो पुलिस मुख्यालय से एक ‘आदेश’ जरूर निकला — लेकिन वह भी आधा-अधूरा। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, बिलासपुर के कार्यालय से 31 मार्च 2026 को जारी आदेश (क्र. उमनि/वपुअ/विला/स्थापना/345/2026) में थाना पचपेड़ी में पदस्थ दो कर्मचारियों को हटाया गया है:

 

प्र.आरक्षक 1342 तेज कुमार रात्रे — थाना पचपेड़ी से रक्षित केंद्र भेजे गए

प्र.आरक्षक 568 अरुण मिश्रा — थाना पचपेड़ी से माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर भेजे गए

 

मगर जिस थाना प्रभारी की नाक के नीचे यह पूरा खेल चल रहा था, जिनकी जिम्मेदारी क्षेत्र में कानून व्यवस्था बनाए रखने की है — उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। न निलंबन, न तबादला।

 

सवालों के घेरे में पुलिस

ग्रामीणों का कहना है कि जुए के इस अड्डे से गांव का माहौल बिगड़ रहा है और युवा पीढ़ी गलत राह पर जा रही है। “जब छोटे कर्मचारी हटाए जा सकते हैं, तो थाना प्रभारी क्यों नहीं? क्या उनके ऊपर किसी का हाथ है?” — यह सवाल अब हर जुबान पर है।

 

आरोप अगर सच हैं, तो यह सिर्फ जुए का मामला नहीं, बल्कि पुलिस तंत्र में बैठे ‘संरक्षण’ की कहानी बन जाता है। ‘घर पहुंच सेवा’ जैसे शब्द इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह एक व्यवस्थित वसूली तंत्र हो सकता है, न कि सिर्फ लापरवाही।

 

अब गेंद प्रशासन के पाले में

फिलहाल दो आरक्षकों का तबादला कर मामले को ठंडा करने की कोशिश जरूर हुई है, लेकिन जनता इसे ‘लीपापोती’ मान रही है। अब देखना यह है कि बिलासपुर पुलिस इस ‘जंगल जुए’ पर सच में लगाम लगाती है, या फिर थाना प्रभारी को बचाने के लिए फाइलों में ही कार्रवाई सिमट कर रह जाती है।

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