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बेलगहना में वन विभाग पर “न्यायिक उत्पीड़न” का आरोप: एक ही केस में दो-दो बार जेल, SC/ST परिवारों का फूटा गुस्सा

न पेड़, न ठूंठ... फिर भी उजाड़ दिया आशियाना" – दोषमुक्त होने के बावजूद फिर सलाखों के पीछे भेजे गए ग्रामीण

बिलासपुर (बेलगहना) 5 अप्रैल 2026 छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के बेलगहना वन परिक्षेत्र से वन विभाग की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। कक्ष क्रमांक 1051, खसरा नंबर 346/1 में हुई कार्रवाई ने न सिर्फ कानून बल्कि मानवता को भी कठघरे में ला दिया है। अनुसूचित जाति-जनजाति के पीड़ित परिवारों का सीधा आरोप है – “जिस गुनाह से अदालत बरी कर चुकी, उसी में दोबारा जेल क्यों?”

 मामला क्या है? 3 पॉइंट में समझिए पूरा विवाद

 20 साल से खेती, फिर भी ‘अतिक्रमणकारी’ का ठप्पा कोनचरा गांव से सटे वन क्षेत्र की नवतोड़ भूमि पर पीड़ित परिवार छत्तीसगढ़ राज्य बनने से पहले से खेती का दावा कर रहे हैं। उनके पास वन समिति के दस्तावेज, ग्राम पंचायत का प्रस्ताव और NOC तक मौजूद है। इसके बावजूद वन विभाग उन्हें “अवैध कब्जाधारी” बताकर कार्रवाई कर रहा है।

 कोर्ट से बरी होने के बाद भी फिर गिरफ्तार – कैसे?  

   सबसे बड़ा सवाल यही है। परिवार के मुताबिक, इसी अतिक्रमण के आरोप में पहले भी केस चला था और न्यायालय ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया था। अब उसी पुराने मामले को उखाड़कर फिर से गिरफ्तारी कर ली गई। ग्रामीण इसे “न्यायिक प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग” बता रहे हैं।

 वीडियो, गाली-गलौज और नाबालिग के सामने बेइज्जती  

   पीड़ितों ने बीट गार्ड समेत वनकर्मियों पर संगीन आरोप लगाए हैं। कार्रवाई के दौरान नाबालिग बच्ची और महिलाओं के सामने वीडियो बनाया गया और अभद्र भाषा का इस्तेमाल हुआ। इस घटना के बाद गांव में गुस्सा उबल रहा है।

 जहां पेड़ ही नहीं, वहां आशियाना कैसे उजड़ा?” – ग्रामीणों का तर्क

 वन विभाग ने परिवारों पर “पशु-पक्षियों के आशियाने उजाड़ने” का केस दर्ज किया है। लेकिन मौके पर पहुंचे ग्रामीण कैमरा लेकर दिखा रहे हैं – “साहब, यहां न एक भी बड़ा पेड़ है, न कटे हुए पेड़ों के ठूंठ। फिर हमने कौन सा जंगल उजाड़ दिया?” ग्रामीणों का आरोप है कि झूठे तथ्यों की फाइल बनाकर उन्हें फंसाया जा रहा है।

 अब आगे क्या? गांव में तनाव, अल्टीमेटम जारी

 पीड़ित परिवारों ने दो टूक कहा है – “या तो दोषी बीट गार्ड और वनकर्मियों को तत्काल सस्पेंड करो, या फिर हम कलेक्टर ऑफिस से लेकर SC/ST आयोग तक जाएंगे।” फिलहाल पूरे इलाके में तनाव का माहौल है। ग्रामीणों की भीड़ वन चौकी के बाहर जुटने लगी है।

 बड़ा सवाल जो प्रशासन को देना होगा जवाब

 अगर न्यायालय एक बार दोषमुक्त कर चुका है, तो उसी मामले में दोबारा गिरफ्तारी किस कानून के तहत? 

जब भूमि पर दशकों से खेती के दस्तावेज मौजूद हैं, तो वन विभाग ने राजस्व रिकॉर्ड से क्रॉस-वेरिफाई क्यों नहीं किया?

नाबालिग और महिलाओं के सामने वीडियो बनाना और अभद्रता करना क्या विभागीय प्रोटोकॉल का हिस्सा है?

 फिलहाल पीड़ित परिवार न्याय की बाट जोह रहे हैं। गेंद अब जिला प्रशासन और वन विभाग के पाले में है – वे कार्रवाई को ‘नियमानुसार’ साबित करेंगे या इसे ‘कमजोर वर्ग का उत्पीड़न’ मानकर दोषियों पर गाज गिराएंगे?

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