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बिलासपुर: हाईकोर्ट से यथास्थिति का आदेश मिलने के बावजूद मस्तूरी में चला बुलडोजर, 70 साल पुराना पट्टे वाला पुश्तैनी मकान जमींदोज, पीड़ित परिवार ने तहसीलदार पर लगाए कोर्ट की अवमानना के गंभीर आरोप

पीड़ित का आरोप- 'बुजुर्ग मां ने दिखाई 1955 की पट्टा कॉपी, फिर भी नहीं रुकी कार्रवाई', प्रशासन का जवाब- '24 अप्रैल पंचनामा की तारीख थी, नोटिस अवधि पूरी होने पर की गई नियमानुसार कार्रवाई

मस्तूरी, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के मस्तूरी तहसील क्षेत्र में एक बेदखली कार्रवाई ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। खुदुभांठा गांव के निवासी अश्वनी टोण्ड्रे ने आरोप लगाया है कि तहसीलदार शिल्पा भगत ने हाईकोर्ट के स्थगन आदेश के बावजूद 20 अप्रैल 2026 को उनके पुश्तैनी मकान पर बुलडोजर चलवा दिया।

20 अप्रैल का घटनाक्रम: क्या हैं आरोप 

प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ित परिवार के अनुसार, 20 अप्रैल 2026 की सुबह करीब 11 बजे तहसीलदार शिल्पा भगत पुलिस बल और JCB मशीन लेकर अश्वनी टोण्ड्रे के घर पहुंचीं। पीड़ित का दावा है कि कार्रवाई शुरू होते ही उनकी 80 वर्षीय बुजुर्ग मां ने 1955 का पट्टा दिखाकर 24 अप्रैल तक का समय मांगा, लेकिन प्रशासन ने कार्रवाई नहीं रोकी। 

आरोप है कि इस दौरान मौके पर तीखी बहस भी हुई। कार्रवाई के दौरान मकान पूरी तरह ढहा दिया गया। घर में मौजूद स्कूली बच्चों को मलबे से अपनी किताबें और जरूरी सामान निकालते हुए देखा गया। पड़ोसियों ने बताया कि परिवार को सामान समेटने का भी पर्याप्त वक्त नहीं दिया गया।

हाईकोर्ट के स्टे को लेकर विवाद 

पीड़ित पक्ष के वकील के मुताबिक, बेदखली नोटिस के खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। 23 अप्रैल को हाईकोर्ट ने आदेश पारित कर एसडीओ की सुनवाई पूरी होने तक यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। 

अश्वनी का आरोप है कि वह स्टे ऑर्डर की कॉपी लेकर जब मौके पर पहुंचे, तब तक मकान का बड़ा हिस्सा ढहाया जा चुका था। उनका दावा है कि आदेश की कॉपी दिखाने के बावजूद कुछ देर तक तोड़फोड़ जारी रही। इसके बाद ही JCB को रोका गया।

1955 के पट्टे का दावा, कार्रवाई पर उठे सवाल

हाईकोर्ट में पीड़ित पक्ष ने 1955 का एक पट्टा पेश किया है। उनका कहना है कि विवादित जमीन शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा नहीं है, बल्कि उनके दादा को तत्कालीन सरकार द्वारा आवंटित की गई थी। 

पीड़ित ने प्रशासन की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि खसरा नंबर 187/2 पर कई अन्य निर्माण और कब्जे भी मौजूद हैं, लेकिन चयनित कार्रवाई केवल उनके मकान के खिलाफ की गई। उन्होंने इसे भेदभावपूर्ण कार्रवाई बताया।

प्रशासन का पक्ष: ‘नियमानुसार हुई कार्रवाई’ 

इस पूरे मामले पर तहसीलदार शिल्पा भगत ने अपना पक्ष रखा है। उन्होंने स्पष्ट किया, “24 अप्रैल की तारीख कब्जाधारी को मकान खाली करने के लिए निर्धारित नहीं थी। वह तिथि राजस्व अमले द्वारा पंचनामा प्रस्तुत करने के लिए तय की गई थी। नोटिस की अवधि पहले ही पूरी हो चुकी थी, इसलिए की गई कार्रवाई पूरी तरह नियमानुसार है।” 

प्रशासन ने पीड़ित द्वारा लगाए गए भेदभाव के आरोपों पर फिलहाल कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।

आगे की राह: अवमानना याचिका और मुआवजे की मांग 

फिलहाल हाईकोर्ट ने मामले में यथास्थिति का आदेश जारी रखा है। पीड़ित परिवार अब तहसीलदार के खिलाफ हाईकोर्ट की अवमानना और धोखाधड़ी की FIR दर्ज करने की मांग कर रहा है। 

अश्वनी टोण्ड्रे ने जिला प्रशासन से 50 लाख रुपये मुआवजा और सरकारी खर्च पर मकान बनवाने की मांग की है। साथ ही पूरे खसरा नंबर 187/2 की निष्पक्ष जांच कर सभी अवैध कब्जों पर एक समान कार्रवाई की मांग भी उठाई है।

मामला बिलासपुर कलेक्टर के संज्ञान में है। जिला प्रशासन ने कहा है कि सभी तथ्यों की जांच कर नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।

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