“बिलासपुर जिले के सीपत स्थित NTPC के राखड़ डेम से ग्राम सुखरीपाली समेत 10 गांव त्रस्त : प्रदूषण-बेरोजगारी पर फूटा ग्रामीणों का गुस्सा”
"सफेद राखड़ का काला खेल" : NTPC सीपत के राखड़ डेम से उजड़ते गांव, रोजगार के वादे निकले हवा-हवाई, ग्रामीणों का फूटा गुस्सा

“सफेद राखड़, काली कमाई, बर्बाद जवानी” : NTPC सीपत के ‘जहर’ से दम तोड़ते 10 गांव, 25 साल से नौकरी का इंतजार, अब आर-पार के मूड में ग्रामीण
सीपत। विकास का दावा करने वाली NTPC के सीपत प्लांट की हकीकत अगर देखनी है तो सुखरीपाली गांव चले आइए। यहां हवा में ऑक्सीजन नहीं, राख उड़ती है। पानी में जीवन नहीं, जहर घुला है। और खेतों में अनाज नहीं, बर्बादी उग रही है।
NTPC के तीन विशाल राखड़ डेम ने 8 से 10 गांवों को ‘गैस चैंबर’ बना दिया है। ग्रामीणों का सब्र अब जवाब दे गया है। धरना स्थल पर माताओं-बहनों की आंखों में आंसू थे और जुबान पर एक ही सवाल – “हमारे बच्चों का कसूर क्या है?”
1. ‘विकास’ नहीं, ‘विनाश’ का राखड़ डेम
सांस लेना भी गुनाह :- सुबह उठते ही घर, बर्तन, कपड़े, सब पर सफेद राख की परत जम जाती है। बच्चे स्कूल जाते हैं तो यूनिफॉर्म राख से सनी होती है। डॉक्टर कहते हैं – “यहां फेफड़े नहीं, राखदान मिलेंगे जांच में”।
खेत हुए कफन-दफन :- जिस जमीन पर कभी धान लहलहाता था, वहां अब राख की 2 इंच मोटी परत है। कौड़िया के किसान श्यामलाल बोलते हैं – “NTPC ने जमीन ली, बदले में बंजर दे दिया। अब खाएं क्या, खिलाएं क्या?”
पानी बना जहर :- गांव का तालाब काला पड़ चुका है। हैंडपंप से निकलता पानी पीने लायक नहीं। मवेशी भी बीमार होकर मर रहे हैं। महिलाओं को 3 किमी दूर से पीने का पानी ढोना पड़ता है।
2. 25 साल का सबसे बड़ा ‘जॉब स्कैम’
साल था 2000 के आसपास। NTPC आई तो अधिकारियों ने गांव-गांव जाकर वादा किया – “एक एकड़ जमीन दोगे, एक नौकरी पाओगे।”
25 साल बीत गए। 80% परिवारों को नौकरी तो दूर, गेट के अंदर झांकने तक नहीं दिया गया। जिनकी पुश्तैनी जमीन गई, उनके बच्चे आज मनरेगा में गड्ढे खोद रहे हैं।
धरने पर बैठी 60 साल की सुनीता बाई फफक पड़ती हैं – “पति की जमीन गई, बेटा बेरोजगार है। अब पोते से कहते हैं कि पढ़-लिखकर क्या करेगा, राख ही तो फांकनी है।”
आरोप है कि अफसरों की मिलीभगत से बाहरी राज्यों के लोगों को बैकडोर से नौकरियां दी गईं, और स्थानीय युवा सिर्फ ‘प्रभावित’ का ठप्पा लेकर रह गए।
3. राखड़ के नीचे दबा ‘करोड़ों का खेल’
ग्रामीण पूछ रहे हैं – नियम कहता है कि राखड़ ईंट-भट्टों और सीमेंट फैक्ट्री भेजी जाए। फिर ये तीन-तीन पहाड़ जैसे डेम क्यों खड़े हैं?
आरोप है कि राखड़ परिवहन और डंपिंग के नाम पर हर साल करोड़ों का बंदरबांट होता है। न कोई निगरानी, न कोई कार्रवाई। “सफेद राख असल में काली कमाई का जरिया बन गई है”, आंदोलन के नेता ने कहा।
अब नहीं सहेंगे : अल्टीमेटम
आंदोलनकारियों ने NTPC प्रबंधन और कलेक्टर को 15 दिन का अल्टीमेटम दिया है। मांगे नहीं मानी तो प्लांट का मुख्य गेट जाम होगा।
मांगे:
48 घंटे में राखड़ उड़ना बंद हो, वरना डेम पर ताला लगेगा
हर बीमार ग्रामीण का मुफ्त इलाज + 10 लाख मुआवजा
1998 से अब तक के हर विस्थापित परिवार को तुरंत स्थायी नौकरी
CBI से राखड़ घोटाले की जांच
फिलहाल सीपत में हालात तनावपूर्ण हैं। एक तरफ सफेद राखड़ का पहाड़ है, दूसरी तरफ ग्रामीणों का काला गुस्सा। देखना है कि NTPC झुकती है या इस बार ‘सफेद राख’ पर ‘लाल क्रांति’ लिखी जाएगी।