कलेक्टर के प्रतिबंध का खुला उल्लंघन: बिल्हा मस्तूरी कोटा में 30 जून तक बैन के बावजूद बोर माफिया बेलगाम, तहसीलदार-एसडीएम फोन तक नहीं उठाते
संजय अग्रवाल के आदेश में कहा था: अवैध खनन की तत्काल सूचना एसडीएम-तहसीलदार को दें, मगर दोनों अफसर फोन रिसीव ही नहीं करते; जनता पूछे तो शिकायत किसको करे?

बिल्हा/मस्तूरी/कोटा, 13 अप्रैल 2026 बिलासपुर जिले में कलेक्टर संजय अग्रवाल द्वारा 30 जून 2026 तक बोर खनन पर लगाया गया पूर्ण प्रतिबंध अब केवल कागजों तक सिमटता नजर आ रहा है। बिल्हा, मस्तूरी और कोटा क्षेत्र में बोर माफिया के हौसले इतने बुलंद हैं कि प्रतिबंधात्मक आदेश की खुलेआम अवहेलना हो रही है। रात के अंधेरे में शुरू हुआ यह खेल अब दिन के उजाले में भी बेरोकटोक जारी है, जबकि प्रशासनिक अमला मूकदर्शक बना हुआ है।
आदेश में क्या कहा था कलेक्टर ने?
कलेक्टर संजय अग्रवाल के प्रतिबंध आदेश में स्पष्ट निर्देश है कि कहीं भी अवैध बोर खनन होते दिखे तो ग्रामीण तत्काल संबंधित एसडीएम और तहसीलदार को सूचना दें। आदेश में राजस्व विभाग से अनुमति प्राप्त किए बिना कोई भी नया बोर खनन प्रतिबंधित किया गया था। इसका उद्देश्य भीषण गर्मी में गिरते भू-जल स्तर को रोकना था। बोर खनन की अनुमति देने का अधिकार केवल एसडीएम और तहसीलदार के पास ही है।
लेकिन जमीन पर हकीकत क्या है?
दिनदहाड़े खनन: बिल्हा मस्तूरी कोटा के रिहायशी इलाकों से लेकर कृषि क्षेत्रों तक बोरिंग मशीनें बिना किसी रोक-टोक के चलती देखी जा रही हैं।
अफसर फोन रिसीव नहीं करते: ग्रामीणों का सबसे बड़ा आरोप है कि जब वे एसडीएम और तहसीलदार को सूचना देने के लिए फोन लगाते हैं तो घंटी बजती रहती है, मगर कोई रिसीव नहीं करता। फोन बंद नहीं है, स्विच ऑफ नहीं है, लेकिन उठाया ही नहीं जाता।
सवाल गंभीर: जब आदेश में कहा गया कि सूचना एसडीएम-तहसीलदार को दें, और वही फोन रिसीव न करें तो आम जनता शिकायत करे तो किसको करे? क्या हर ग्रामीण सीधे कलेक्टर कार्यालय तक पहुंच सकता है?
प्रशासनिक निष्क्रियता का आलम
स्थानीय लोगों द्वारा कई बार शिकायत करने की कोशिश के बावजूद न तो मशीनें जब्त की गईं और न ही दोषियों पर कोई प्राथमिकी दर्ज हुई। सूत्रों के अनुसार रसूखदार लोगों के संरक्षण में ही सबसे ज्यादा अवैध खनन को अंजाम दिया जा रहा है।
गर्मी से पहले ही सूख रहे जल स्रोत
अप्रैल माह में ही कुओं और पुराने बोरवेलों ने पानी देना कम कर दिया है। अवैध खनन के कारण भू-जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है:
किसान परेशान: रबी फसल के बाद खरीफ की तैयारी के लिए खेतों में सिंचाई का संकट गहरा गया है।
पेयजल की किल्लत: बिल्हा मस्तूरी कोटा के कई गांवों में महिलाओं को पानी के लिए दूर-दराज भटकना पड़ रहा है।
पशुओं पर संकट: तालाब और नाले सूख चुके हैं। बोरवेल ही एकमात्र सहारा था, जो अब अवैध खनन की भेंट चढ़ रहा है।
ग्रामीणों में आक्रोश: “आदेश तो दे दिया, सुनवाई कौन करेगा?”
स्थानीय निवासियों का कहना है कि कलेक्टर ने 30 जून तक प्रतिबंध भू-जल संरक्षण के लिए लगाया था। लेकिन प्रतिबंध का जिस तरह उल्लंघन हो रहा है, उससे लगता है कि आदेश का कोई महत्व ही नहीं बचा। ग्रामीणों का सवाल है: “जब सूचना देने के लिए एसडीएम-तहसीलदार फोन रिसीव ही नहीं करते, तो क्या कलेक्टर साहब खुद गांव-गांव आकर मशीनें रुकवाएंगे? क्या प्रशासन बड़ी त्रासदी का इंतजार कर रहा है?”
ग्रामीणों की 4 प्रमुख मांगें
तत्काल कार्रवाई: क्षेत्र में चल रही सभी अवैध बोरिंग मशीनों को 48 घंटे के भीतर जब्त किया जाए।
कानूनी कार्रवाई: मशीन मालिकों, भू-स्वामियों और उन्हें संरक्षण देने वालों पर कलेक्टर के आदेश की अवहेलना तथा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई हो।
हेल्पलाइन जारी हो: अवैध खनन की सूचना के लिए जिला स्तर पर एक डेडिकेटेड कंट्रोल रूम नंबर जारी किया जाए जिसका फोन हमेशा उठे।
जवाबदेही तय हो: पटवारी से लेकर एसडीएम तक, यह तय हो कि किसकी लापरवाही से प्रतिबंध के बावजूद खनन चल रहा है और जिम्मेदार अफसर फोन क्यों रिसीव नहीं कर रहे।
सीधा सवाल: आदेश का पालन कौन कराएगा?
बिल्हा मस्तूरी कोटा में हो रहा अवैध बोर खनन केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है। यह सीधे तौर पर कलेक्टर संजय अग्रवाल के प्रतिबंधात्मक आदेश का उल्लंघन है। आदेश में सूचना तंत्र भी बताया गया था, लेकिन जब एसडीएम-तहसीलदार ही फोन रिसीव न करें तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजमी है।
30 जून तक लगाया गया प्रतिबंध भू-जल बचाने का अंतिम उपाय था। यदि अब भी मशीनों पर रोक नहीं लगी और सूचना तंत्र दुरुस्त नहीं हुआ तो आने वाले दो महीनों में तीनों क्षेत्र भीषण जल संकट की चपेट में आ जाएंगे।
अब गेंद प्रशासन के पाले में है। उसे तय करना है कि आदेश का पालन कराना है या जनता को यह मानने पर मजबूर करना है कि प्रतिबंध केवल औपचारिकता थी।




