सारंगढ़-बिलाईगढ़, छत्तीसगढ़: लोकतंत्र के मंदिर में जब ‘साहब बहादुर’ खुद ही पुजारी बनकर चढ़ावे की जगह ‘खून’ मांगने लगे, तो समझ लो व्यवस्था सड़ चुकी है।
"कुर्सी खून मांग रही है": सारंगढ़ में अफसर बना 'गब्बर', बोला- 'सवाल पूछेगा तो यहीं गाड़ दूंगा', CCTV में कैद हुआ तांडव

सारंगढ़-बिलाईगढ़, छत्तीसगढ़: लोकतंत्र के मंदिर में जब ‘साहब बहादुर’ खुद ही पुजारी बनकर चढ़ावे की जगह ‘खून’ मांगने लगे, तो समझ लो व्यवस्था सड़ चुकी है। सारंगढ़ के कृषि विभाग में तैनात विस्तार अधिकारी प्रवीण पटेल ने कुर्सी की ताकत को लाठी-डंडे की ताकत समझ लिया। कसूर सिर्फ इतना कि एक निडर पत्रकार पोषराम साहू ने ‘किसान सम्मान निधि’ के नाम पर चल रहे ‘किसान अपमान कांड’ पर सवाल दाग दिए।
जवाब क्या मिला? अभद्र भाषा, थप्पड़, लात-घूंसे और जान से मारने की धमकी। सरकारी दफ्तर देखते ही देखते ‘क्राइम ब्रांच का टॉर्चर रूम’ बन गया। और हद तो तब हो गई जब बीच-बचाव करने आए वकील को भी ‘साहब’ ने कॉलर पकड़कर घसीटा।
भगवान का शुक्र है CCTV जिंदा था, वरना यह ‘जनसेवक’ इसे भी ‘आपसी समझ’ बता कर निपटा देता। अब 2 मिनट 17 सेकंड का वो वीडियो सरकार की नींद उड़ाने के लिए काफी है। सवाल सिर्फ मारपीट का नहीं है, सवाल है — क्या अब छत्तीसगढ़ में सच बोलना, सवाल पूछना ‘देशद्रोह’ से बड़ा गुनाह हो गया है?
पोस्टमार्टम रिपोर्ट: कैसे 5 मिनट में ‘सरकारी दफ्तर’ बना ‘गैंगवार का मैदान’
कांड की जगह कृषि विभाग, सारंगढ़ थी। वो पवित्र जगह जहां अन्नदाता की फाइल चलनी चाहिए थी, वहां ‘अफसरशाही की बंदूक’ चली। मुख्य विलेन प्रवीण पटेल, कृषि विस्तार अधिकारी हैं। तनख्वाह सरकार से लेते हैं, वफादारी ‘कमीशनखोरी’ से निभाते हैं। इस पूरे कांड के हीरो युवा पत्रकार पोषराम साहू हैं, जिनकी कलम से ‘साहब’ को आग लग गई।
कांड की टाइमिंग अप्रैल 2026, दोपहर 12:37 बजे की है। जब सूरज सिर पर था और ‘साहब’ का पारा सातवें आसमान पर। विवाद की चिंगारी तब भड़की जब पत्रकार ने पूछा, “साहब, किसान सम्मान निधि की लिस्ट में फर्जी नाम कैसे? पात्र किसान भटक रहे हैं।” बस इतना सुनते ही ‘ईमानदार अफसर’ का नकाब उतर गया।
क्लाइमेक्स तब आया जब पत्रकार के मुंह से निकला, “साहब, जवाब नहीं मिला तो कलेक्टर से शिकायत करेंगे”। ये 5 शब्द सुनते ही प्रवीण पटेल मेज पर मुक्का मारकर उठे और चिल्लाए “तू मुझे कानून सिखाएगा?” फिर जो हुआ वो CCTV ने दुनिया को दिखा दिया।
आंखों देखा हाल: चश्मदीद बोले — ‘लगा साहब नशे में हैं’
नाम न छापने की शर्त पर दफ्तर के एक कर्मचारी ने बताया, “साहब सुबह से ही तनाव में थे। जैसे ही पत्रकार ने रजिस्टर मांगा, वो आपे से बाहर हो गए। पहले जमकर अपशब्द कहे, फिर कॉलर पकड़कर घसीटा। पत्रकार जमीन पर गिर गया तो लात से मारा। वकील साहब बचाने आए तो उन्हें धक्का देकर गिरा दिया। 5 मिनट तक दफ्तर में सिर्फ चीख-पुकार थी। हम सब डर के मारे कोने में दुबक गए। लगा कि आज खून-खराबा हो जाएगा।”
वो 3 सवाल जिनका जवाब देते-देते सरकार के पसीने छूट जाएंगे
1. कानून सिर्फ गरीब के लिए है क्या, हुजूर?
नियम सबको पता है। अगर मैं-आप सरकारी दफ्तर में जाकर बाबू से ऊंची आवाज में बात कर लें, तो 5 मिनट में हवलदार आ जाता है। BNS की धारा 221 ‘सरकारी कार्य में बाधा’ लगाकर सीधे लॉकअप में ठूंस दिया जाता है। जमानत के लिए भी जूते घिसने पड़ते हैं।
लेकिन जब AC में बैठा ‘अफसर’ ऑन-कैमरा गुंडागर्दी करे, पत्रकार-वकील को पीटे, तो FIR के लिए ‘जांच कमेटी’ बैठेगी? ‘विभागीय कार्रवाई’ का झुनझुना पकड़ाया जाएगा? कलेक्टर साहब जवाब दो: प्रवीण पटेल पर हत्या के प्रयास की FIR कब कटेगी? उसे हथकड़ी कब पहनाई जाएगी? या उसके लिए संविधान अलग से छपा है?
2. किसान सम्मान निधि या अफसर सम्मान योजना?
सवाल सीधा है। पत्रकार ने कौन सा एटम बम पूछ लिया था जो ‘साहब’ की कुर्सी हिल गई? सूत्रों की मानें तो सारंगढ़ में किसान सम्मान निधि की लिस्ट में सैकड़ों अपात्र लोग मौज काट रहे हैं। असली किसान कलेक्ट्रेट के चक्कर काट रहा है। क्या प्रवीण पटेल इस पूरे ‘खेल’ के डायरेक्टर हैं? क्या उन्हें डर था कि पत्रकार की खबर से उनकी ‘ऊपरी कमाई’ बंद हो जाएगी? इस मारपीट की जड़ में करोड़ों का घोटाला तो नहीं छुपा? EOW से जांच क्यों नहीं?
3. वर्दी का रौब या किसी ‘मंत्री’ का हाथ?
इतनी हिम्मत एक अदने से विस्तार अधिकारी में आई कहां से? भरे दफ्तर में, CCTV के सामने पत्रकार को पीट देना कोई छोटी बात नहीं। क्या प्रवीण पटेल के सिर पर किसी ‘सफेद कुर्ते’ वाले का हाथ है? क्या उसे पता है कि ‘ऊपर तक सेटिंग’ है, कोई बाल भी बांका नहीं कर पाएगा? अगर ऐसा नहीं है तो कलेक्टर साहब 1 घंटे में निलंबन ऑर्डर क्यों नहीं निकालते?
CCTV फुटेज: 137 सेकंड का वो सच जो पूरी सरकार को नंगा कर देगा
पुलिस सूत्रों से लीक हुई जानकारी के अनुसार 2 मिनट 17 सेकंड के वीडियो में 3 सबसे खतरनाक सीन हैं।
पहला सीन 0:11 सेकंड पर शुरू होता है जहां प्रवीण पटेल टेबल पर इतनी जोर से मुक्का मारता है कि पानी का गिलास गिर जाता है। चिल्लाता है: “तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे सवाल करने की?”
दूसरा सीन 0:43 सेकंड पर दिखता है जब वह पत्रकार का कॉलर पकड़कर अपनी तरफ खींचता है और गाल पर थप्पड़ जड़ देता है। पत्रकार लड़खड़ाकर गिरता है।
तीसरा सीन 1:29 सेकंड पर सामने आता है जब वकील बचाने आता है तो प्रवीण पटेल चिल्लाता है “तू बीच में मत पड़ वकील, वरना तुझे भी यहीं निपटा दूंगा” और उसे धक्का देकर दीवार से सटा देता है।
पत्रकार संगठनों की मांग: इस फुटेज को तुरंत जब्तकर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के सामने पेश किया जाए। क्योंकि ‘तकनीकी खराबी’ के नाम पर सबूत मिटाने का इतिहास इस प्रदेश में बहुत पुराना है।
सारंगढ़ से रायपुर तक उबाल: ‘अब खून का बदला निलंबन नहीं, बर्खास्तगी’ घटना के बाद छत्तीसगढ़ जर्नलिस्ट वेलफेयर यूनियन ने ‘जंग’ का ऐलान कर दिया है।
72 घंटे का अल्टीमेटम दिया गया है। पहली मांग है कि प्रवीण पटेल तत्काल बर्खास्त हो। निलंबन का लॉलीपॉप नहीं चलेगा। दूसरी मांग है कि हत्या के प्रयास, SC/ST एक्ट अगर लागू हो, और शासकीय पद के दुरुपयोग की धाराओं में FIR हो। तीसरी मांग है कि पीड़ित पत्रकार को 10 लाख मुआवजा और सरकारी नौकरी दी जाए, क्योंकि उसकी जान को खतरा है। चौथी मांग पूरे किसान सम्मान निधि घोटाले की CBI जांच की है। पांचवीं मांग है कि सारंगढ़ कलेक्टर सार्वजनिक माफी मांगें कि उनके जिले में पत्रकार सुरक्षित नहीं।
चेतावनी दी गई है: “अगर मंगलवार सुबह 11 बजे तक आदेश नहीं निकला, तो छत्तीसगढ़ का हर पत्रकार कलम रखकर सड़क पर उतरेगा। मुख्यमंत्री आवास का घेराव होगा। पूरे प्रदेश में चक्काजाम होगा। सरकार लिख ले, ये लड़ाई अब आर-पार की है।”
विपक्ष का वार: ‘भूपेश राज से ज्यादा गुंडाराज’
विपक्ष ने विधानसभा के विशेष सत्र की मांग कर दी है। नेता प्रतिपक्ष ने कहा, “पिछली सरकार को ये लोग कोसते थे। आज इनके राज में अफसर तालिबानी बन गए हैं। मुख्यमंत्री जी, आपके अफसर पत्रकारों को पीट रहे हैं और आप ‘विकास यात्रा’ निकाल रहे हैं। शर्म करो।”
आखिरी सवाल: कलेक्टर-SP साहब, आपकी अंतरात्मा जिंदा है या मर गई?
18 घंटे हो गए। एक पत्रकार अस्पताल में पड़ा है। एक वकील सदमे में है। पूरा जिला थू-थू कर रहा है। सोशल मीडिया पर SarangarhKaGundaOfficer नंबर 1 ट्रेंड कर रहा है।
लेकिन जिला प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। न कलेक्टर का बयान आया, न SP ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। ऐसा लगता है मानो जिले में कुछ हुआ ही न हो।
यह चुप्पी सबसे बड़ा गुनाह है। यह चुप्पी चीख-चीख कर कह रही है कि ‘हम अपने आदमी को बचाएंगे, चाहे कानून की धज्जियां उड़ जाएं’।
शासन-प्रशासन कान खोलकर सुन ले: ये 2026 का भारत है। CCTV का जमाना है। जनता अब बेवकूफ नहीं। अगर इस गुंडे अफसर को बचाया गया, तो याद रखना: कल तुम्हारी कुर्सी भी जनता ऐसे ही घसीटकर सड़क पर ले आएगी।
इंसाफ चाहिए। अभी चाहिए। निलंबन नहीं, बर्खास्तगी चाहिए। जांच नहीं, जेल चाहिए।
क्योंकि अगर आज एक सवाल पूछने पर पिटाई हो गई, तो कल तुम्हारे बच्चे स्कूल में ‘लोकतंत्र’ का मतलब क्या पढ़ेंगे? “जहां सवाल करो तो लात पड़े” — यही?
(Neeraj Kumar Tiwari, Editor-in-Chief)




