“लोरमी के झिरिया जंगल में वर्दी पर हमला: अवैध खनन रोकने गए 4 फॉरेस्ट गार्ड लहूलुहान, लाठी-डंडों से पीटकर किया अधमरा — बिलासपुर रेफर, सिस्टम कठघरे में”
झिरिया कांड: जब जंगल के 'रक्षक' ही बन गए शिकार, खनन माफिया के गढ़ में टूटा कहर

मुंगेली/लोरमी। छत्तीसगढ़ के लोरमी वन परिक्षेत्र के झिरिया जंगल से आई तस्वीरों ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। अवैध खनन की शिकायत पर जांच करने पहुंचे वन विभाग के चार जवानों पर ग्रामीणों की भीड़ इस कदर टूट पड़ी कि कानून की वर्दी तार-तार हो गई।

5 मिनट में बिगड़ा माहौल: सवाल पूछने गए थे, जवाब में मिली लाठियां

मिली जानकारी के अनुसार वन विभाग के चार नवपदस्थ फॉरेस्ट गार्ड को सूचना मिली थी कि झिरिया क्षेत्र में मुरुम और पत्थर का अवैध खनन धड़ल्ले से चल रहा है। टीम जैसे ही मौके पर पहुंची, कुछ लोगों से बहस शुरू हुई। आरोप है कि देखते ही देखते दर्जनों ग्रामीण लाठी-डंडे लेकर जमा हो गए और चारों तरफ से हमला कर दिया।
हमला इतना बर्बर था कि चारों गार्ड गंभीर रूप से घायल हो गए। किसी के सिर से खून की धार बह रही थी, तो किसी के हाथ-पैर में फ्रैक्चर हो गया। जंगल में गूंजती चीखों के बीच आरोपी वारदात को अंजाम देकर फरार हो गए।

लोरमी से बिलासपुर: जिंदगी और मौत से जूझते जवान
घायल जवानों को आनन-फानन में लोरमी के 50 बिस्तर अस्पताल लाया गया। लेकिन हालत नाजुक देख डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद चारों को तत्काल बिलासपुर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया। एक साथ चार वर्दीधारियों के लहूलुहान हालत में पहुंचने से अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई।

3 सवाल जो व्यवस्था को नंगा कर रहे हैं
सुरक्षा कहां थी?: क्या संवेदनशील इलाके में खनन माफिया के खिलाफ कार्रवाई के लिए वन विभाग ने अपने जवानों को बिना पुलिस सुरक्षा के भेज दिया? यह लापरवाही किसकी?
हमलावर कौन?: क्या ये सिर्फ ग्रामीणों का गुस्सा था या फिर अवैध खनन से जुड़े माफिया ने ग्रामीणों को आगे कर वर्दी पर हमला करवाया? पुरानी रंजिश या नई साजिश?
कार्रवाई कब?: घटना के बाद FIR दर्ज हुई या नहीं? हमलावरों की पहचान कर गिरफ्तारी हुई या वर्दी पर हमला करने वाले अब भी बेखौफ घूम रहे हैं?

दहशत में महकमा, सवालों में घिरा प्रशासन
इस घटना के बाद लोरमी ही नहीं, पूरे मुंगेली जिले के वन अमले में खौफ का माहौल है। हर फॉरेस्ट गार्ड के मन में एक ही सवाल है — “क्या ड्यूटी करना गुनाह है?”। झिरिया क्षेत्र में तनाव पसरा हुआ है और अवैध खनन का कारोबार जस का तस जारी है।
फिलहाल पुलिस और वन विभाग के अधिकारी “जांच चल रही है” कहकर मामले को टाल रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जंगल के रक्षक ही महफूज नहीं, तो जंगल को कौन बचाएगा?
अब निगाहें प्रशासन पर हैं — क्या इस बार कानून की लाठी चलेगी, या फिर खनन माफिया की लाठी ही कानून बनकर रह जाएगी?
(Neeraj Kumar Tiwari, Editor-in-Chief)



