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एरमशाही-गतौरा धान खरीदी में गड़बड़ी पर FIR, खाली ट्रक कांड ने खोली पोल: किसान बोले, CBI से हो 5 साल की जांच

एरमशाही-गतौरा धान खरीदी में गड़बड़ी पर FIR, खाली ट्रक कांड ने खोली पोल: किसान बोले, CBI से हो 5 साल की जांच

बिलासपुर | दिनांक: 17 अप्रैल 2026 मस्तूरी विकासखंड की एरमशाही और गतोरा धान खरीदी समितियों में धांधली के आरोपों को लेकर प्रशासन और किसानों के बयान एक दूसरे के बिल्कुल उलट हैं। खाद्य विभाग जहां इसे ‘मामूली लेखा अंतर’ बताकर FIR तक सीमित कार्रवाई की बात कर रहा है, वहीं स्थानीय किसान और ग्रामीण खाली ट्रक कांड को सबूत मानकर बड़े घोटाले और जिला स्तर के अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं।

प्रशासन का पक्ष: ‘पूरे जिले में सिर्फ 5,375 बोरी का अंतर’  

खाद्य विभाग ने साफ किया है कि खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में बिलासपुर जिले में धान खरीदी नियमानुसार हुई है। विभाग के मुताबिक सोशल मीडिया पर 2100 क्विंटल यानी 21,000 बोरी धान लंबित होने की खबर पूरी तरह भ्रामक है। असल में अंतर सिर्फ 215 मीट्रिक टन का है। 40 किलो की एक बोरी के हिसाब से यह 2,15,000 किलो यानी कुल 5,375 बोरी बनता है। विभाग का कहना है कि लेखा-मिलान पूरा होते ही यह अंतर भी स्पष्ट हो जाएगा।

अभी तक की कार्रवाई में गतोरा और एरमशाही समितियों के जिम्मेदारों पर एफआईआर दर्ज कर दी गई है। दोनों केंद्रों में स्टॉक और दस्तावेजों का मिलान चल रहा है। विभाग ने यह भी कहा कि यदि मिलान में कमी पाई जाती है तो नियमानुसार संबंधित समिति की कमीशन राशि से वसूली की जाएगी, जिससे शासन को कोई आर्थिक नुकसान नहीं होगा। जिला खाद्य कार्यालय का दावा है कि इन दो समितियों को छोड़कर पूरे जिले में कहीं भी अनियमितता नहीं मिली है।

जनसंपर्क कार्यालय की प्रेस विज्ञप्ति में बड़ी चूक, गुमराह करने का आरोप  

मामले में एक नया मोड़ तब आया जब जनसंपर्क कार्यालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में भी भारी गलती सामने आई। विज्ञप्ति में अंतर को ‘215 क्विंटल धान’ बताया गया है, जबकि खाद्य विभाग के अनुसार वास्तविक आंकड़ा ‘215 मीट्रिक टन’ है। 

गौर करें: 215 क्विंटल = 21,500 किलो यानी सिर्फ 537.5 बोरी, जबकि 215 मीट्रिक टन = 2,15,000 किलो यानी 5,375 बोरी। यानी प्रेस विज्ञप्ति में आंकड़ा 10 गुना कम करके बताया गया। किसानों ने इसे सीधे-सीधे जनता और मीडिया को गुमराह करने की कोशिश बताया है। उनका कहना है कि जब सरकारी विज्ञप्ति में ही इतनी बड़ी गड़बड़ी है तो जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजमी है।

शिवसेना प्रमुख की शिकायत भी दरकिनार, कलेक्टर को दिया था लिखित आवेदन एरमसाही धान खरीदी केंद्र घोटाले का

मामले को दबाने के आरोपों के बीच एक और गंभीर खुलासा हुआ है। शिवसेना प्रमुख ने बताया कि उन्होंने एरमशाही धान घोटाले की पूरी जानकारी कलेक्टर संजय अग्रवाल को लिखित आवेदन के साथ पहले ही दे दी थी। आवेदन में खाली ट्रक कांड और अधिकारियों की भूमिका का जिक्र कर तत्काल कार्रवाई की मांग की गई थी। किसानों का आरोप है कि कलेक्टर को सबूत के साथ शिकायत देने के बावजूद उसे पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया और कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इसे लेकर ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि जब जिले के सबसे बड़े अधिकारी को लिखित में अवगत कराने के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो जिला स्तरीय जांच से न्याय की उम्मीद कैसे की जाए।

किसानों का आरोप: ‘क्लीनचिट झूठी, 90 घंटे खड़ा रहा धांधली का सबूत’  

एरमशाही केंद्र के किसानों ने खाद्य विभाग के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि विभाग 5,375 बोरी के अंतर की बात कर मामले को दबाना चाहता है, जबकि हकीकत में यहां सुनियोजित घोटाला चल रहा है। किसानों ने ‘खाली ट्रक कांड’ को इसका सबसे बड़ा सबूत बताया। उनके मुताबिक कुछ दिन पहले ग्रामीणों ने केंद्र पर एक खाली ट्रक को पकड़ा था। आरोप है कि संस्था प्रबंधक बबलू घृतलहरे 72 और 94 क्विंटल धान का बिना तौल किए, सिर्फ खाली बारदाना ट्रक में लोड करवा रहे थे। शक होने पर ग्रामीणों ने ट्रक को रुकवा दिया जो करीब 90 घंटे तक खरीदी केंद्र में ही खड़ा रहा।

किसानों का सबसे बड़ा आरोप अधिकारियों की भूमिका पर है। उनका कहना है कि इस घटना की जानकारी तत्काल डीआर जयसवाल, खाद्य नियंत्रक अमृत कुजूर, नोडल अधिकारी आशीष दुबे और ब्रांच मैनेजर सुशील पनौरे को दी गई थी। इसके बावजूद कोई भी अधिकारी मौके पर जांच के लिए नहीं पहुंचा। इससे ग्रामीणों को यकीन है कि एरमशाही में हो रही धांधली में प्रबंधक से लेकर जिला स्तर के अधिकारियों की मिलीभगत है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केंद्र शुरू से ही विवादों में रहा है।

कहां फंस रहा है पेंच: दोनों पक्षों के दावे  

अंतर की मात्रा को लेकर प्रशासन पूरे मामले को 215 मीट्रिक टन यानी 5,375 बोरी का मामूली लेखा अंतर मान रहा है। वहीं किसान इसे खाली ट्रक से फर्जी एंट्री का बड़ा घोटाला बता रहे हैं। उनका कहना है कि असल आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है।

प्रेस विज्ञप्ति को लेकर प्रशासन लेखा-मिलान जारी होने की बात कह रहा है। जबकि किसानों का आरोप है कि जनसंपर्क की विज्ञप्ति में 215 मीट्रिक टन को 215 क्विंटल बताकर आंकड़ा 10 गुना कम दिखाया गया। इसे गुमराह करने की सीधी कोशिश बताया जा रहा है।

कार्रवाई के मुद्दे पर प्रशासन का कहना है कि FIR दर्ज कर ली गई है और लेखा-मिलान जारी है। अधिकारियों के अनुसार वसूली की प्रक्रिया से शासन को कोई नुकसान नहीं होगा। दूसरी तरफ किसान सवाल उठा रहे हैं कि शिवसेना प्रमुख के लिखित आवेदन और 90 घंटे तक ट्रक खड़ा रहने की सूचना देने के बाद भी कोई अधिकारी मौके पर क्यों नहीं पहुंचा। इसे वो अधिकारियों की मिलीभगत का सबूत मान रहे हैं।

जिम्मेदारी तय करने पर प्रशासन इसे सिर्फ समिति स्तर की लापरवाही बता रहा है और पूरे जिले में बाकी जगह सब ठीक होने का दावा कर रहा है। मगर किसान मानते हैं कि प्रबंधक बबलू घृतलहरे के साथ-साथ प्राधिकृत अधिकारी ब्रांच मैनेजर सुशील पनौरे तक इस खेल में शामिल हैं।

जांच को लेकर प्रशासन जिला स्तर की जांच को पर्याप्त मान रहा है। वहीं किसान जिला स्तर की जांच को नाकाफी बताते हुए CBI या EOW से पिछले 5 साल के रिकॉर्ड की जांच की मांग कर रहे हैं।

आगे क्या: CBI जांच की मांग, आंदोलन की चेतावनी  

इस टकराव के बीच किसान संगठनों ने दो टूक मांग रखी है। उनका कहना है कि चूंकि मामले में जिला स्तर के अधिकारियों के नाम हैं, जनसंपर्क की विज्ञप्ति में आंकड़े दबाने की कोशिश हुई है, और अब कलेक्टर को लिखित शिकायत देने के बाद भी उसे दरकिनार कर दिया गया, इसलिए स्थानीय प्रशासन से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं है। किसानों की मांग है कि एरमशाही और गतोरा समितियों के पिछले पांच वर्षों के पूरे रिकॉर्ड की जांच CBI, EOW या किसी केंद्रीय एजेंसी से कराई जाए। इससे सभी दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका सामने आ सकेगी।

ग्रामीणों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि जल्द उच्च स्तरीय जांच के आदेश नहीं दिए गए तो वे कलेक्टर कार्यालय का घेराव करेंगे और उग्र आंदोलन शुरू करेंगे।

गौरतलब है कि फिलहाल प्रशासन की तरफ से सिर्फ एरमशाही और गतोरा समिति का ही जिक्र किया गया है। संभावना जताई जा रही है कि जांच आगे बढ़ने पर आने वाले दिनों में कुछ और समितियों के नाम भी इस घोटाले में सामने आ सकते हैं।

निष्कर्ष  

एक तरफ प्रशासन 5,375 बोरी के अंतर को तकनीकी खामी बता रहा है, तो दूसरी तरफ किसान 90 घंटे खड़े रहे खाली ट्रक, प्रेस विज्ञप्ति में 10 गुना कम दिखाए गए आंकड़े, और कलेक्टर को शिकायत देने के बाद भी कार्रवाई न होने को घोटाले और उसे दबाने की कोशिश का जीता-जागता सबूत मान रहे हैं। अब पूरा मामला इस पर टिका है कि जांच स्थानीय स्तर पर निपटती है या केंद्रीय एजेंसी तक जाती है।

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