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“रिटायरमेंट के बाद भी कुर्सी से चिपके डॉ. अनिल गुप्ता! बिलासपुर जिला अस्पताल बना ‘जुगाड़ तंत्र’ का अड्डा, मरीजों की सांसें भगवान भरोसे”

मौखिक फरमान पर 'सुपर बॉस' बने रिटायर्ड सिविल सर्जन | OPD से लेकर डिस्चार्ज तक 'एक्स-साहब' का राज | नियमों की चिता जलाकर DMF फंड से वेतन का खेल | CMHO ने साधी चुप्पी, जवाबदेही कौन लेगा?

बिलासपुर न्यायधानी के जिला अस्पताल में कानून की किताब को रद्दी समझकर ताक पर रख दिया गया है। सिविल सर्जन की कुर्सी पर रिटायरमेंट के बाद भी डॉ. अनिल गुप्ता का कब्जा बरकरार है। न कोई लिखित आदेश, न वित्त विभाग की मुहर, न फिटनेस का कागज। बस एक ‘जुबानी हुक्म’ और पूरा सरकारी अस्पताल ‘रिटायर्ड साहब’ की निजी क्लिनिक बन गया।

जुगाड़ राज’ का पूरा कच्चा चिट्ठा  

डॉ. अनिल गुप्ता मेडिसिन MD हैं और सिविल सर्जन पद से रिटायर हो चुके हैं। प्रभारी सिविल सर्जन डॉ. मनीष श्रीवास्तव छुट्टी पर गए और जाते ही ‘मौखिक सेटिंग’ से गुप्ता साहब को कुर्सी थमा दी गई। अब आलम ये है कि OPD में मरीजों की लाइन, वार्ड का दौरा, भर्ती का फैसला, डिस्चार्ज की पर्ची और फाइलों पर साइन, सब कुछ रिटायर्ड अफसर के अंगूठे से चल रहा है। इलाज भी वही, एडमिनिस्ट्रेशन भी वही। यानी जिला अस्पताल वन मैन शो बन चुका है।

नियम गए तेल लेने, ‘जरूरत’ का ढोल पीटा जा रहा  

कानून चीख चीख कर कहता है: 65 पार के किसी भी डॉक्टर को कुर्सी देने से पहले वित्त विभाग की मंजूरी, शासन की अनुमति और मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट चाहिए। लेकिन बिलासपुर में ‘विशेषज्ञों की कमी’ का रोना रोकर सारे नियमों को कचरे में फेंक दिया गया। 

अंदर की बात ये है कि DMF फंड से वेतन देने की फाइल दौड़ रही है, मगर वित्त विभाग ने आज तक हरी झंडी नहीं दी। सवाल सीधा है: जब कागज पर मंजूरी नहीं तो सैलरी कहां से निकलेगी? और अगर कल किसी मरीज के साथ अनहोनी हो गई तो जेल कौन जाएगा? रिटायर्ड डॉक्टर या वो अफसर जिसने मौखिक आदेश दिया?

CMHO मैडम का ‘नो रिस्पॉन्स मोड’  

इस पूरे ‘खेल’ पर जिले की स्वास्थ्य बॉस डॉ. शुभा गढ़वाल से जवाब मांगने की कोशिश हुई। दर्जनों बार फोन घनघनाया, लेकिन CMHO मैडम ने फोन उठाना अपनी शान के खिलाफ समझा। जब स्वास्थ्य विभाग की मुखिया ही जवाबदेही से भागेगी तो नीचे वाले सिस्टम से क्या उम्मीद करें?

सिस्टम से 5 आग जैसे सवाल:  

कानून क्या सिर्फ आम आदमी के लिए है? बिना लिखित आदेश के रिटायर्ड अफसर को अस्पताल सौंपना कौन सी धारा में वैध है?  

DMF फंड सरकारी तिजोरी है या किसी की जेब? वित्त की मंजूरी बिना एक रुपया भी खर्च नहीं हो सकता, फिर यहां वेतन का जुगाड़ कौन कर रहा है?  

मरीज मरे तो जिम्मेदार कौन? डॉ. गुप्ता के साइन से हुए किसी इलाज में चूक हुई तो कोर्ट में जवाब कौन देगा?  

‘जरूरत’ के नाम पर कब तक नियमों का कत्ल? अगर यही नॉर्मल है तो कल को कोई भी रिटायर अफसर कुर्सी पर आकर बैठ जाएगा?  

शासन मौन क्यों? स्वास्थ्य मंत्री और कलेक्टर तक ये फाइल पहुंची या नहीं, या सबकी आंखें बंद हैं?

यह सिर्फ एक डॉक्टर की कुर्सी का मोह नहीं है। ये बिलासपुर के लाखों मरीजों की जिंदगी, सरकारी अस्पताल की साख और सिस्टम में बचे खुचे भरोसे का सवाल है। 

अब गेंद स्वास्थ्य विभाग के बड़े अफसरों के पाले में है। क्या ‘मौखिक राज’ पर बुलडोजर चलेगा, या फिर जिला अस्पताल यूं ही ‘रिटायर्ड भरोसे’ भगवान के सहारे चलता रहेगा? जनता देख रही है।

“__कैप्शन:”__

पहला कैप्शन:  

“कुर्सी से चिपका मोह, कानून हुआ बेहोश: रिटायरमेंट के बाद भी OPD में ‘साहब’ की दादागिरी, मरीज पूछ रहे इलाज कौन दे रहा, डॉक्टर या भूतपूर्व अफसर?”

दूसरा कैप्शन:  

“कागज पर सन्नाटा, कुर्सी पर कब्जा: मौखिक आदेश का तमाशा, बिलासपुर जिला अस्पताल बना नियमों की कब्रगाह”

तीसरा कैप्शन:  

“सवाल जिंदा है, जवाब गायब: बिना मंजूरी इलाज का ठेका, DMF फंड से वेतन का खेल, अगर मरीज की मौत हुई तो हत्यारा कौन?”

(Neeraj Kumar Tiwari, Editor-in-Chief)

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