मस्तूरी-जयरामनगर-मल्हार-जोंधरा में ‘चखना-कोचिया गैंग’ का तांडव: 80 की क्वार्टर 200 में, ‘पार्सल सर्विस’ चालू, आबकारी सर्किल अधिकारी का फोन सिर्फ दलाल के लिए ‘फ्री’!
चखना दुकान बनी 'मिनी ठेका', कोचिया बना 'होम डिलीवरी बॉय'... सरकारी दुकान में ताला, चखना में 'माल' और 'ताल' दोनों फुल — सिस्टम का 'जुगाड़' खुलेआम!

‘चखना+कोचिया’ की जोड़ी: बिलासपुर का सबसे हिट ‘बिजनेस मॉडल’
मस्तूरी, जयरामनगर, मल्हार, जोंधरा — यहां शराब का खेल अब सिर्फ दुकान तक सीमित नहीं है। अब एंट्री हो चुकी है ‘कोचिया गैंग’ की। ये वो स्पेशल लोग हैं जो न दुकान चलाते हैं, न चखना। इनका काम सिर्फ एक है ‘सरकारी माल को प्राइवेट रेट पर सेट करना’।
कैसे चलता है ‘चखना-कोचिया’ का खेल? स्टेप बाय स्टेप समझिए:
सीन 1: सरकारी दुकान का ‘ड्रामा’
सुबह 11 बजे। सरकारी दुकान का शटर आधा खुला। सेल्समैन सुस्त आवाज में — **”खत्म है भैया, कल आना”**। ग्राहक मायूस।
सीन 2: चखना दुकान की ‘एंट्री’
ग्राहक 10 कदम चलकर चखना पहुंचता है। वहां प्लेट में मटन-सूखा और टेबल के नीचे ‘क्वार्टर का कार्टन’ तैयार। रेट? 200 रुपये, नो बारगेनिंग।
सीन 3: कोचिया का ‘धमाका’
अगर ग्राहक कहे “पैसे कम हैं” या “यहां पीने में रिस्क है”, तो चखना वाला आंख मारकर बोलता है — **”रुको, कोचिया को फोन लगाता हूं”**।
2 मिनट में बाइक पर ‘कोचिया भाई’ की एंट्री। हाथ में थैला, थैले में 80 की क्वार्टर। लेकिन आपके लिए **’स्पेशल रेट’ 200 रुपये**। घर तक छोड़ने का **’डिलीवरी चार्ज’ 50 रुपये अलग**।
मतलब: दुकान बंद, चखना चालू, कोचिया ‘ब्लिंकिट’ से भी फास्ट।
कोचिया कौन? ‘सिस्टम का दामाद’ क्यों?
कोचिया कोई आम आदमी नहीं है। यह चखना दुकान, सरकारी सेल्समैन और ‘ऊपर बैठे साहब’ के बीच का ‘कड़ी’ है।
‘माल उठाऊ’ गैंग: सुबह सरकारी दुकान का शटर खुलने से पहले ही कोचिया 5-10 पेटी ‘सेट’ कर लेता है। बिल कटा 80 का, माल गया चखना में।
‘रेट फिक्सर’: एरिया में कोई 150 से कम में बेचे तो कोचिया ही ‘समझा’ देता है। रेट पूरे मस्तूरी से जोंधरा तक एक रहेगा — 200 रुपये। ‘यूनियन’ पक्की है।
‘हफ्ता अधिकारी’: हर चखना दुकान से शाम को ‘हिस्सा’ लेता है। फिर उसका ‘हिस्सा’ ऊपर तक जाता है। इसलिए साहब का फोन कोचिया के लिए 24×7 ‘ग्रीन’ रहता है।
जनता का फोन = ‘ मैं मीटिंग में हूं’
कोचिया का फोन = ‘हां बोल भाई, कितना माल चाहिए?’
चखना दुकान: अब सिर्फ ‘चना-मूंगफली’ नहीं, ‘चलता-फिरता ठेका’
पहले चखना मतलब 2 प्लेट अंडा-भुजिया। अब जयरामनगर से मल्हार तक चखना मतलब:
‘डे-नाइट सर्विस’: सरकारी दुकान बंद, चखना चालू।
‘बिना लाइन, बिना बिल’: 80 की चीज 200 में, कैश दो और निकलो।
‘पार्सल+सर्विस’: यहीं पियो, या कोचिया से घर मंगवा लो।
‘सेफ जोन’: पुलिस रेड नहीं, आबकारी सर्किल अधिकारी की दबिश नहीं। क्योंकि ‘मंथली’ टाइम पर पहुंच जाती है।
ग्रामीणों का तंज: “सरकार ने ठेका बंद किया था, इन लोगों ने हर चखना को ठेका बना दिया। ऊपर से ‘होम डिलीवरी’ फ्री!”
सबसे चटपटा सच: ‘शॉर्टेज’ का बटन किसके हाथ में?
सूत्र बताते हैं कि ‘शॉर्टेज’ का स्विच कोचिया के हाथ में है। जिस दिन ‘ऊपर’ से ‘पेमेंट’ लेट हो, उस दिन सरकारी दुकान में “आज माल ही नहीं आया” का बोर्ड लग जाता है। पेमेंट पहुंचते ही चखना में ‘बाढ़’ आ जाती है।
मतलब: देसी की नदी सूखती नहीं, ‘नहर का मुंह’ कोचिया की तरफ मोड़ दिया जाता है।
अब जनता का ‘फाइनल वार्निंग’
“चखना वाला लूटे, कोचिया कूटे, साहब फोन न उठाए अब बर्दाश्त नहीं।” — मल्हार के युवाओं ने चेतावनी दी है।
मांग साफ है:
हर चखना दुकान में छापा मरो, कार्टन गिनो। 80 की क्वार्टर मिली तो लाइसेंस जप्त + जेल।
कोचियों की लिस्ट बनाओ, कॉल डिटेल निकालो। किस अफसर से रोज बात, सब सामने आएगा।
सरकारी दुकान की CCTV और ‘इश्यू रजिस्टर’ मिलाओ। माल कहां गया, 1 घंटे में पता चल जाएगा।
कलेक्टर साहब, एक बार ‘चखना-कोचिया’ गैंग पर बुलडोजर चला दो, मस्तूरी से जोंधरा तक ‘सेटिंग राज’ खुद ब खुद ढह जाएगा। वरना जनता जब सड़क पर उतरेगी, तो चखना की प्लेट भी टूटेगी और ‘कुर्सी’ भी।
(Neeraj Kumar Tiwari, Editor-in-Chief)




