बिलासपुर में फर्जीवाड़े का पर्दाफाश 4 वकीलों पर लटकी गिरफ्तारी की तलवार, कोर्ट को गुमराह कर मृतक की भाभी को बनाया पत्नी!
मृतक की भाभी को पत्नी बताकर मुआवजा हड़पने वाले 4 वकीलों पर गिरफ्तारी की तलवार, कोर्ट ने कहा- 'कानून के रक्षक ही बने भक्षक'!

बिलासपुर। मोटर एक्सीडेंट केस में मुआवजा हड़पने के लिए कोर्ट को ही गुमराह करने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। बिलासपुर में 4 अधिवक्ताओं के खिलाफ गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज हुई है और अब उनकी गिरफ्तारी कभी भी हो सकती है। विशेष न्यायाधीश (एट्रोसिटी) कोर्ट ने चारों की अग्रिम जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि मामला बेहद गंभीर है और कानून के जानकारों द्वारा किया गया यह कृत्य माफी योग्य नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला थाना सिविल लाइन क्षेत्र का है। मोटर दुर्घटना दावा प्रकरण में मृतक प्रभात कुजूर की मौत के बाद मुआवजे के लिए कोर्ट में दावा पेश किया गया। इसमें प्रेमिका कुजूर को मृतक की पत्नी बताकर शपथपत्र और दस्तावेज लगाए गए।
लेकिन जांच के दौरान ही बड़ा खुलासा हो गया। प्रेमिका कुजूर खुद कोर्ट में पेश हुईं और साफ कहा कि वह मृतक प्रभात की पत्नी नहीं, बल्कि उसके भाई की पत्नी यानी भाभी हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उन्होंने न तो कोई शपथपत्र दिया और न ही किसी वकील को केस लड़ने के लिए अधिकृत किया।
इतना ही नहीं, दूसरी महिला मिथिलता कुजूर ने भी बयान दिया कि उन्होंने किसी भी दस्तावेज या वकालतनामे पर हस्ताक्षर नहीं किए।
कोर्ट ने दिए FIR के आदेश, वकील बोले- हम निर्दोष
इस खुलासे के बाद संबंधित न्यायालय ने तुरंत थाना सिविल लाइन को चारों आरोपियों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज करने के निर्देश दिए। आरोप है कि वकीलों ने जानबूझकर फर्जी तरीके से दूसरी महिला को खड़ा कर उसकी पहचान मृतक की पत्नी के रूप में कराई और झूठा शपथपत्र पेश कर दिया।
गिरफ्तारी से बचने के लिए आरोपी अधिवक्ता एनपी चंद्रवंशी (62), भगवती कश्यप (50), शुभम चंद्रवंशी (32) निवासी हनुमानगढ़ी चौक, राजकिशोर नगर, सरकंडा और सूरज वस्त्रकार (29) निवासी गतौरा, मस्तूरी ने अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई थी।
बचाव पक्ष का तर्क था कि उन्होंने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर काम किया और वे निर्दोष हैं। वहीं अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि आरोपी खुद अधिवक्ता हैं, कानून के जानकार होने के बाद भी कोर्ट को गुमराह करना गंभीर अपराध है।
कोर्ट ने कहा- राहत नहीं, केस गंभीर
दोनों पक्षों को सुनने के बाद विशेष न्यायाधीश ने कहा कि प्रथम दृष्टया आरोप बेहद गंभीर प्रकृति के हैं। ऐसे में आरोपियों को अग्रिम जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने चारों की याचिका खारिज कर आदेश की कॉपी थाना सिविल लाइन को भेजने का निर्देश दिया।
इन गंभीर धाराओं में केस दर्ज, 10 साल तक की सजा
पुलिस ने इस फर्जीवाड़े में एक साथ कई संगीन धाराओं में केस दर्ज किया है। इनमें धारा 228 कोर्ट का अपमान, 229 झूठा प्रतिरूपण, 233 झूठे साक्ष्य/दस्तावेज पेश करना, 246 फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल, 318 धोखाधड़ी, 335-336 लापरवाही, 338 गंभीर हानि पहुंचाना और 340(2), 3(5) न्यायिक प्रक्रिया से छेड़छाड़ व सामूहिक अपराध शामिल हैं।
इनमें धारा 233 और 246 में 7 साल तक, जबकि धारा 338 में 10 साल तक की सजा का प्रावधान है। यानी मामला सीधे गंभीर आपराधिक श्रेणी का है।
अब आगे क्या?
अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद अब पुलिस कभी भी चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर सकती है। गिरफ्तारी के बाद आरोपियों के पास नियमित जमानत के लिए निचली अदालत या हाई कोर्ट जाने का विकल्प बचेगा।
क्यों अहम है यह कार्रवाई?
वकीलों को न्याय का रक्षक माना जाता है। अगर कानून के जानकार ही कोर्ट को गुमराह करेंगे तो आम जनता का भरोसा डगमगाएगा। कोर्ट का यह सख्त रुख साफ संदेश देता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं, चाहे वह वकील ही क्यों न हो। इस कार्रवाई से जनता का न्याय व्यवस्था पर विश्वास और मजबूत होगा।




